Middle East लंबे समय से दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है। इस क्षेत्र में इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कई दशकों से बना हुआ है। समय-समय पर यह तनाव सैन्य कार्रवाई, मिसाइल हमलों और कूटनीतिक टकराव के रूप में सामने आता रहा है। जब भी इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष बढ़ता है, अमेरिका की भूमिका भी चर्चा का विषय बन जाती है। ऐसे में यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस पूरे संघर्ष में इजरायल की भूमिका क्या रही है और वह किन कारणों से ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाता है।
इजरायल का कहना है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। इजरायल को आशंका है कि यदि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर लेता है तो इससे पूरे मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन बदल सकता है और इजरायल की सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण इजरायल वर्षों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़ी निगरानी और प्रतिबंध लगाने की मांग करता रहा है। इजरायल को आशंका है कि यदि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर लेता है तो हूती विद्रोही और हिजबुल्लाह के हाथ में परमाणु हथियार लग सकते है जो इजराइल के लिए हमेशा चिंता का विषय रहा है |
इजरायल ने कई बार दावा किया है कि उसने ईरान से जुड़े सैन्य ठिकानों, मिसाइल निर्माण केंद्रों और परमाणु सुविधाओं पर कार्रवाई की है। इन अभियानों का उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना और संभावित खतरों को पहले ही रोकना बताया गया है। कई मामलों में इजरायल ने आधिकारिक रूप से जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने इन अभियानों को इज़राइली रणनीति का हिस्सा माना है।
इजरायल और अमेरिका के बीच लंबे समय से मजबूत सुरक्षा संबंध हैं। अमेरिका इजरायल को रक्षा तकनीक, सैन्य सहायता और खुफिया जानकारी उपलब्ध कराता है। दोनों देश मिसाइल रक्षा प्रणाली, आतंकवाद विरोधी अभियानों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर मिलकर काम करते हैं। हालांकि, हर सैन्य कार्रवाई अमेरिका और इजरायल द्वारा संयुक्त रूप से संचालित हो, ऐसा आवश्यक नहीं है। कई अवसरों पर इजरायल ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय भी लिए हैं।
ईरान ने इजरायल की कार्रवाइयों का कई बार जवाब मिसाइल और ड्रोन हमलों के माध्यम से दिया है। इसके अलावा ईरान पर यह आरोप भी लगाया जाता रहा है कि वह क्षेत्र के कुछ सशस्त्र संगठनों को समर्थन देता है, जो इजरायल के खिलाफ सक्रिय रहते हैं। दूसरी ओर, ईरान का कहना है कि वह अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों की रक्षा कर रहा है तथा इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों का जवाब देना उसका अधिकार है।
इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल इन दोनों देशों तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता, वैश्विक तेल बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विश्व राजनीति पर पड़ता है। जब भी संघर्ष तेज होता है, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है और कई देशों को अपनी विदेश नीति तथा सुरक्षा रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ता है।
संयुक्त राष्ट्र और कई अन्य देशों ने समय-समय पर दोनों पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान खोजने की अपील की है। अनेक देशों का मानना है कि लगातार सैन्य कार्रवाई से क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ेगी, जबकि बातचीत और समझौते के माध्यम से स्थायी समाधान की संभावना अधिक है।
इजरायल की भूमिका मुख्य रूप से अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने और ईरान की सैन्य तथा परमाणु क्षमताओं को सीमित करने की रणनीति पर आधारित रही है। वहीं ईरान इन कार्रवाइयों को अपने खिलाफ आक्रामक नीति मानता है और उनका विरोध करता है। अमेरिका, इजरायल का महत्वपूर्ण सहयोगी होने के कारण इस पूरे घटनाक्रम में प्रभावशाली भूमिका निभाता है। यह समझना आवश्यक है कि इस संघर्ष को लेकर अलग-अलग देशों, सरकारों और विशेषज्ञों की राय भिन्न हो सकती है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले विश्वसनीय और अद्यतन स्रोतों से जानकारी लेना महत्वपूर्ण है। भविष्य में इस क्षेत्र की स्थिति काफी हद तक कूटनीतिक प्रयासों, क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था और संबंधित देशों के निर्णयों पर निर्भर करेगी।